Chandra Shekhar Azad Death Anniversary: जानिए कितने आजाद थे चंद्रशेखर क्यों पूरा देश उन्हें क्रांतिकारी का दर्जा देता है।

Chandra Shekhar Azad Death Anniversary: आज हम चंद्रशेखर आजाद की पुण्यतिथि पर आजाद शेखर से महत्वपूर्ण बातें जानेंगे ।भारत (India) के स्वतंत्रता संग्राम में चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) एक बहुत ही सम्मानीय नाम है. ऊपरी तौर पर आजाद के नाम कोई बहुत बड़ी उपलब्धि नहीं है,

लेकिन 1920 के दशक में चंद्रशेखर आजाद को हर क्रांतिकारी (Revolutionaries) के अलावा आजादी की लड़ाई लड़ने वाले भी पसंद किया करते थे. चाहे क्रांतिकारियों का प्रशिक्षण हो या फिर आजादी की लड़ाई के लिए धन की व्यवस्था करना हो, आजाद सब में माहिर थे.

एक शख्स जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम (Indian Freedom Movement) में काकोरी घटना में राम प्रसाद बिस्मिल, भगत सिंह, जैसे क्रांतिकारियों का साथी था.

उसने सांडर्स हत्याकांड में भगत सिंह का साथ दिया था. वह कभी अग्रेजों के हाथ नहीं आया और वह पहला क्रांतिकारी भी नहीं था जिसने अंग्रेजों के हाथ में आने की जगह खुद को गोली मारना पसंद किया था. लेकिन फिर भी हम चंद्रशेखर आजाद (Chandra Shekhar Azad) को एक महान क्रांतिकारी मानते हैं

. आखिर चंद्रशेखर आजाद में ऐसा क्या था जो हमें ज्यादा आकर्षित करता है. वे इतने लोकप्रिय क्रांतिकारी क्यों थे. 27 फरवरी को उनकी पुण्यतिथि (Chandrashekhar Azad Death Anniversary) पर हम यही जानने का प्रयास करेंगे.

Chandra Shekhar Azad Death Anniversary

परिचय : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महानायक एवं लोकप्रिय स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई, 1906 को मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले के भाबरा नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता का नाम पंडित सीताराम तिवारी एवं माता का नाम जगदानी देवी था। उनके पिता ईमानदार, स्वाभिमानी, साहसी और वचन के पक्के थे। यही गुण चंद्रशेखर को अपने पिता से विरासत में मिले थे

Chandra Shekhar Azad Death Anniversary

विवरण :  चंद्रशेखर आजाद 14 वर्ष की आयु में बनारस गए और वहां एक संस्कृत पाठशाला में पढ़ाई की। वहां उन्होंने कानून भंग आंदोलन में योगदान दिया था। 1920-21 के वर्षों में वे गांधीजी के असहयोग आंदोलन से जुड़े। वे गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जहां उन्होंने अपना नाम ‘आजाद’, पिता का नाम ‘स्वतंत्रता’ और ‘जेल’ को उनका निवास बताया। जज इनकी बातों से नाराज होकर
उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्‌‘ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया। इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए। क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद का जन्मस्थान भाबरा अब ‘आजादनगर’ के रूप में जाना जाता है। आज उन्ही Chandra Shekhar Azad Death Anniversary पूरा देश मना रहा है।
जल्दी ही आजाद क्रांतिकारियों के सहयोगी होकर हिंदुस्तान रिपब्लिक एसोसिएशन में शामिल हो गए है. बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद (Chandra Shekhar Azad) एक साहसी, आक्रामक अंदाज वाले, चतुर, जांबाज क्रांतिकारी साबित हुए. आजाद ने कुछ समय के लिए झांसी को भी अपना गढ़ बनाया था जहां वे ओरछा के पास जंगल में अपने साथियों को निशानीबाजी का प्रशिक्षण देते थे. और इस दौरान वे पंडितहरिशंकर ब्रह्मचारी के छद्म नाम से शिक्षण भी किया करते थे.
क्रांतिकारियों (Revolutionaries) के लक्ष्यों को हासिल करने के करने के लिए बहुत से धन की जरूरत पड़ी तो बिस्मिल ने अन्य क्रांतिकारियों के साथ मिलकर 9 अगस्त 1925 को काकोरी में चलती ट्रेन को रोककर ब्रिटिश खजाना लूटने की योजना बनाई. काकोरी स्टेशन (Kakori) पर हुई लूट से ब्रिटिश हुकूमत हिल गई आजाद (Chandra Shekhar Azad) और उनके साथियों के पीछे पड़ गई कोकोरी कांड के सभी आरोपी एक एक करके गिरफ्तार होते रहे लेकिन आजाद हर बार पुलिस को चकमा देने में पूरी तरह से सफल होते रहे
Chandra Shekhar Azad Death Anniversary
आजाद (Chandra Shekhar Azad) का व्यक्तित्व उनके नाम के मुताबिक हमेशा ही आजाद ही रहा उनकी सोच भी काफी आजाद थी, वे अपने सिद्धांतों पर अडिग और समर्पित रहे उन्होंने संकल्प लिया था कि वे कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और उन्हें फांसी लगाने का मौका अंग्रेजों को कभी नहीं मिल सकेगा. अपने इस वचन को भी आजाद ने पूरी तरह से निभाया. 27 फरवरी 1931 में मुठभेड़ के दौरान आजाद ने अंग्रेजों के हाथों पड़ने देने के बजाय खुद को गोली मारने का विकल्प चुना अंग्रेजों ने चुपचाप अंतिम संस्कार भी कर दिया था, लेकिन उनकी अस्थि यात्रा में भारी संख्या में उनके चाहने वाले शामिल हुए थे. 

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